नई दिल्ली: केंद्र की राजनीति एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ संसद के आगामी मॉनसून सत्र पर पूरे देश की निगाहें टिकी हैं। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के नेतृत्व वाली मोदी सरकार राज्यसभा में दो-तिहाई बहुमत के बेहद करीब मानी जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार सरकार को इस लक्ष्य तक पहुँचने के लिए केवल छह सांसदों के समर्थन की आवश्यकता है। ऐसे में यह सवाल तेज हो गया है कि क्या सरकार इस सत्र में परिसीमन (Delimitation) जैसे बड़े और संवेदनशील मुद्दे को आगे बढ़ाएगी?
क्या है परिसीमन?
परिसीमन वह प्रक्रिया है जिसके तहत जनसंख्या के आधार पर लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण किया जाता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं का प्रतिनिधित्व लगभग समान हो।
भारत में 1976 के बाद जनसंख्या नियंत्रण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से सीटों के पुनर्वितरण पर रोक लगा दी गई थी। बाद में इस रोक को बढ़ाकर वर्ष 2026 तक कर दिया गया। अब यह अवधि समाप्त होने के करीब है, इसलिए परिसीमन का मुद्दा फिर चर्चा के केंद्र में है।
सरकार के लिए क्यों अहम है दो-तिहाई बहुमत?
संविधान में बड़े बदलाव या कुछ महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित करने के लिए संसद में विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है। यदि सरकार राज्यसभा में भी पर्याप्त समर्थन जुटा लेती है, तो कई लंबे समय से लंबित सुधारों पर आगे बढ़ने की संभावना मजबूत हो सकती है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि सरकार आवश्यक समर्थन हासिल कर लेती है, तो परिसीमन से जुड़े प्रारंभिक कदम, चर्चा या समिति गठन जैसे प्रयास मॉनसून सत्र में देखने को मिल सकते हैं।
दक्षिणी राज्यों की चिंता
परिसीमन को लेकर सबसे बड़ी बहस दक्षिण भारत के राज्यों से जुड़ी है। तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों का तर्क है कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है। यदि भविष्य में केवल जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण किया गया, तो उनकी लोकसभा सीटों का अनुपात घट सकता है, जबकि अधिक जनसंख्या वाले राज्यों की सीटें बढ़ सकती हैं।
इसी कारण यह मुद्दा केवल चुनावी गणित नहीं बल्कि संघीय ढांचे और राज्यों के प्रतिनिधित्व से भी जुड़ा हुआ माना जा रहा है।
विपक्ष की रणनीति
विपक्षी दल सरकार से परिसीमन की रूपरेखा स्पष्ट करने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि किसी भी बड़े बदलाव से पहले सभी राज्यों के साथ व्यापक संवाद और सर्वसम्मति आवश्यक है। विपक्ष यह भी चाहता है कि सीटों के पुनर्वितरण का आधार केवल जनसंख्या न होकर अन्य मानकों पर भी विचार किया जाए।
मॉनसून सत्र में क्या संभव है?
हालांकि अभी तक सरकार की ओर से परिसीमन विधेयक लाने की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक हलकों में इस विषय पर चर्चा लगातार तेज है। यदि सरकार राज्यसभा में आवश्यक समर्थन सुनिश्चित करने में सफल होती है, तो इस दिशा में महत्वपूर्ण पहल देखने को मिल सकती है।
हालांकि इतना स्पष्ट है कि परिसीमन जैसा संवेदनशील विषय व्यापक राजनीतिक सहमति, संवैधानिक प्रक्रिया और विस्तृत विचार-विमर्श की मांग करता है। इसलिए मॉनसून सत्र में यदि कोई कदम उठता भी है, तो वह आगे की प्रक्रिया की शुरुआत माना जाएगा, न कि उसका अंतिम चरण।
मोदी सरकार का राज्यसभा में दो-तिहाई बहुमत के करीब पहुँचना राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वहीं परिसीमन का मुद्दा आने वाले वर्षों में भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा संवैधानिक और चुनावी विषय बन सकता है। अब सबकी निगाहें मॉनसून सत्र पर हैं कि क्या सरकार इस दिशा में कोई ठोस पहल करती है या फिर यह मुद्दा व्यापक राजनीतिक सहमति बनने तक इंतजार करेगा।

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