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"Don't Question the Brave: Kumar Vishwas Says Political Critics Must Respect Army's Valour"
Viral

“Don’t Question the Brave: Kumar Vishwas Says Political Critics Must Respect Army’s Valour”

By Saba
September 7, 2026 8 Min Read
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राष्ट्रवाद से कश्मीर तक, कुमार विश्वास ने बताई देश और सेना के रिश्ते की  कहानी - kumar vishwas on nationalism army kashmir and patriotism ntcpsc -  AajTak

राष्ट्रवाद, राजनीति और सेना का शौर्य: कठघरे में खड़े सवालों के बीच कुमार विश्वास की बेबाक राय

भूमिका: देश और सैनिक की पहचान सबसे पहले
किसी भी स्वतंत्र राष्ट्र की संप्रभुता उसकी सीमाओं पर तैनात सैनिकों के हौसले और देशवासियों के सामूहिक आत्मसम्मान पर टिकी होती है। आजतक के विशेष सत्र ‘सुरक्षा सभा’ के मंच पर जब विख्यात कवि और प्रखर वक्ता डॉ. कुमार विश्वास ने अपनी बात रखनी शुरू की, तो उन्होंने सीधे तौर पर देश और सेना के बीच के इसी अटूट रिश्ते को रेखांकित किया। कुमार विश्वास ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि दुनिया के किसी भी कोने में चले जाइए, एक नागरिक की सबसे पहली और बुनियादी पहचान उसका देश होता है। चाहे कोई पोलैंड के क्राको में हो या अल्बानिया के किसी छोटे शहर में, वहाँ आपकी क्षेत्रीयता या धर्म मायने नहीं रखता, वहाँ आपकी पहचान सिर्फ ‘भारतीय’ के रूप में होती है। यही वजह है कि जो सैनिक सीमाओं पर खड़े होकर इस पहचान को सुरक्षित रखते हैं, उनके प्रति आभार और सम्मान व्यक्त करना हर नागरिक का परम कर्तव्य है।

सेना के पराक्रम पर राजनीति क्यों?
लेख का सबसे महत्वपूर्ण और विचारणीय हिस्सा सेना के पराक्रम पर होने वाली राजनीति से जुड़ा है। कुमार विश्वास ने अतीत के एक बड़े विवाद का जिक्र करते हुए कहा कि जब हमारी सेना सीमा पार जाकर अपनी वीरता का प्रदर्शन करती है, तो देश के भीतर से ही सबूत मांगे जाने लगते हैं। उन्होंने बेहद कड़े लहजों में कहा कि राजनीतिक असहमति लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा हो सकती है, लेकिन जब बात सेना के शौर्य की हो, तो उस पर सवाल नहीं उठाए जाने चाहिए।

उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी लोकतांत्रिक देश में सरकार या प्रधानमंत्री की नीतियों की आलोचना करना नागरिकों और विपक्षी दलों का अधिकार है। नीतियां गलत हो सकती हैं, फैसलों में खामियां हो सकती हैं और उन पर खुलकर बहस होनी चाहिए। लेकिन इस राजनीतिक विरोध की आंच कभी भी सेना के त्याग, बलिदान और साहस पर नहीं आनी चाहिए। सैनिकों के पराक्रम को राजनीतिक चश्मे से देखना बंद करना होगा, क्योंकि वे किसी पार्टी के लिए नहीं बल्कि तिरंगे की आन-बान और शान के लिए अपनी जान दांव पर लगाते हैं।

राष्ट्रवाद का राजनीतिकरण और जवाबदेही से भागती सरकारें
राष्ट्रवाद के मुद्दे पर कुमार विश्वास ने न केवल सेना के आलोचकों को घेरा, बल्कि राष्ट्रवाद के नाम पर अपनी विफलताओं को छिपाने वाली ताकतों पर भी तीखा प्रहार किया। उन्होंने एक बेहद व्यावहारिक बात कही कि आज के दौर में राष्ट्रवाद को बढ़ाना और घटाना, दोनों ही राजनीति का हिस्सा बन चुका है। एक तरफ जहां कुछ लोग इसे पूरी तरह अप्रासंगिक बताने की कोशिश करते हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ लोग इसका इस्तेमाल जनता का ध्यान भटकाने के लिए करते हैं।

कुमार विश्वास ने सत्ता पक्ष को आगाह करते हुए कहा कि प्रशासनिक विफलताओं और विकास के सवालों पर केवल ‘भारत माता की जय’ का नारा देकर जवाबदेही से नहीं बचा जा सकता, क्योंकि सरकार से काम का हिसाब मांगना नागरिकों का अधिकार है।

कश्मीर, साहित्य और राष्ट्रवाद का सार
कश्मीर के अपने दौर के अनुभवों का जिक्र करते हुए उन्होंने वहां आए बड़े जमीनी बदलाव को रेखांकित किया, जहां कभी अलगाव की भावना थी, वहीं अब विकास और बेहतर भविष्य की उम्मीदें हैं। इस बदलाव में मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ-साथ विपरीत परिस्थितियों में काम करने वाले सैनिकों का बड़ा योगदान रहा है। इसके साथ ही, उन्होंने साहित्य और सेना के ऐतिहासिक संबंधों को समझाते हुए बताया कि कैसे कवि सैनिकों के जज्बे को ऊर्जा देते हैं और कर्तव्य का बोध कराते हैं। अंत में उन्होंने कहा कि राष्ट्रवाद केवल नारों का नाम नहीं है, बल्कि यह देश की सुरक्षा, आत्मसम्मान और लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रति सजग रहने का नाम है।

राष्ट्रवाद, राजनीति और सेना का शौर्य: कठघरे में खड़े सवालों के बीच कुमार विश्वास की बेबाक राय

भूमिका: वैश्विक मंच पर राष्ट्र और नागरिक की पहचान

किसी भी स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र की पहचान केवल उसके भूगोल, अर्थव्यवस्था या राजनीतिक व्यवस्था से नहीं होती, बल्कि उसकी सीमाओं पर तैनात सैनिकों के हौसले और उसके नागरिकों के सामूहिक आत्मसम्मान से होती है। आजतक के विशेष सत्र ‘सुरक्षा सभा’ के मंच पर जब विख्यात कवि और प्रखर वक्ता डॉ. कुमार विश्वास ने अपनी बात रखनी शुरू की, तो उन्होंने देश और सेना के बीच के इसी अटूट और पवित्र रिश्ते को रेखांकित किया। कुमार विश्वास ने बेहद तार्किक और स्पष्ट शब्दों में कहा कि दुनिया के किसी भी कोने में चले जाइए, एक मनुष्य की सबसे पहली और बुनियादी पहचान उसका देश होता है।

उन्होंने अपने वैश्विक दौरों का व्यावहारिक उदाहरण देते हुए समझाया कि यदि कोई भारतीय पोलैंड के क्राको शहर में या अल्बानिया के किसी सुदूर छोटे कस्बे में जाता है, तो वहाँ के लोग उसकी प्रांतीयता, जाति, शहर या धर्म के बारे में नहीं जानते। वहाँ केवल एक ही सवाल पूछा जाता है कि ‘आप कहाँ से हैं?’ और हर भारतीय का सीना तानकर दिया गया जवाब होता है— “आई एम इंडियन, मैं भारत से हूँ।” यह वैश्विक पहचान हमें वह राष्ट्र देता है जिसे सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी हमारी सेना उठाती है। इसलिए, जो सैनिक शून्य से नीचे के तापमान और दुर्गम पहाड़ियों पर खड़े होकर देश को यह भरोसा देते हैं कि हमारी सीमाएँ सुरक्षित हैं, उनके प्रति आभार व्यक्त करना किसी भी सजग नागरिक का बुनियादी कर्तव्य बन जाता है।


सेना के पराक्रम पर राजनीति: राष्ट्रीय अस्मिता से खिलवाड़ क्यों?

लेख का सबसे संवेदनशील और विचारणीय पहलू सेना के शौर्य पर होने वाली समकालीन राजनीति से जुड़ा हुआ है। कुमार विश्वास ने अतीत के कुछ राजनीतिक विवादों और सर्जिकल स्ट्राइक जैसे सैन्य अभियानों का परोक्ष संदर्भ देते हुए कहा कि हमारा सबसे बड़ा वैचारिक संकट तब उत्पन्न होता है जब सेना द्वारा सीमा पार जाकर दिखाए गए पराक्रम पर देश के भीतर से ही सबूत मांगे जाने लगते हैं। उन्होंने बेहद कड़े और गंभीर लहजे में कहा कि किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र में राजनीतिक असहमति, विचारधाराओं का टकराव और नीतियों पर विरोध स्वाभाविक भी है और जरूरी भी, लेकिन इस विरोध की एक स्पष्ट लक्ष्मण रेखा होनी चाहिए।

विपक्ष या किसी भी नागरिक को तत्कालीन सरकार, प्रधानमंत्री या रक्षा मंत्री की रणनीतियों की आलोचना करने का पूरा अधिकार है। यदि सरकार की नीतियां दोषपूर्ण हैं, तो उन पर संसद से लेकर सड़क तक तीखे सवाल पूछे जाने चाहिए। परंतु, जब देश की सेना अपने प्राणों की बाजी लगाकर किसी मिशन को अंजाम देती है, तो उस सैन्य अभियान की प्रामाणिकता पर सवाल उठाना सीधे तौर पर सैनिकों के मनोबल को चोट पहुँचाना है। राजनीतिक असहमति को सेना के त्याग, बलिदान और शौर्य से पूरी तरह अलग रखा जाना चाहिए, क्योंकि सैनिक किसी एक राजनीतिक दल के कार्यकर्ता नहीं, बल्कि तिरंगे की आन-बान और शान के प्रहरी होते हैं।


राष्ट्रवाद का राजनीतिकरण: जब नारों को बनाया जाता है ढाल

कुमार विश्वास ने न केवल सेना के आलोचकों को कटघरे में खड़ा किया, बल्कि राष्ट्रवाद के नाम पर अपनी प्रशासनिक और राजनीतिक विफलताओं को छिपाने वाली शक्तियों पर भी उतना ही तीखा प्रहार किया। उन्होंने एक अत्यंत व्यावहारिक सत्य को उजागर करते हुए कहा कि आज के दौर में राष्ट्रवाद को बढ़ाना और घटाना, दोनों ही विशुद्ध राजनीति का हिस्सा बन चुके हैं। एक तरफ जहां एक धड़ा राष्ट्रवाद को पूरी तरह अप्रासंगिक और दकियानूसी बताने की बौद्धिक राजनीति करता है, वहीं दूसरी तरफ कुछ राजनीतिक दल राष्ट्रवाद का जरूरत से ज्यादा ढोल पीटकर बुनियादी मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाने की कोशिश करते हैं।

राष्ट्रवाद, राजनीति और सेना का शौर्य: कठघरे में खड़े सवालों के बीच कुमार विश्वास की बेबाक राय

भूमिका: वैश्विक मंच पर राष्ट्र और नागरिक की पहचान

किसी भी स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र की पहचान केवल उसके भूगोल, अर्थव्यवस्था या राजनीतिक व्यवस्था से नहीं होती, बल्कि उसकी सीमाओं पर तैनात सैनिकों के हौसले और उसके नागरिकों के सामूहिक आत्मसम्मान से होती है। आजतक के विशेष सत्र ‘सुरक्षा सभा’ के मंच पर जब विख्यात कवि और प्रखर वक्ता डॉ. कुमार विश्वास ने अपनी बात रखनी शुरू की, तो उन्होंने देश और सेना के बीच के इसी अटूट और पवित्र रिश्ते को रेखांकित किया। कुमार विश्वास ने बेहद तार्किक और स्पष्ट शब्दों में कहा कि दुनिया के किसी भी कोने में चले जाइए, एक मनुष्य की सबसे पहली और बुनियादी पहचान उसका देश होता है।

उन्होंने अपने वैश्विक दौरों का व्यावहारिक उदाहरण देते हुए समझाया कि यदि कोई भारतीय पोलैंड के क्राको शहर में या अल्बानिया के किसी सुदूर छोटे कस्बे में जाता है, तो वहाँ के लोग उसकी प्रांतीयता, जाति, शहर या धर्म के बारे में नहीं जानते। वहाँ केवल एक ही सवाल पूछा जाता है कि ‘आप कहाँ से हैं?’ और हर भारतीय का सीना तानकर दिया गया जवाब होता है— “आई एम इंडियन, मैं भारत से हूँ।” यह वैश्विक पहचान हमें वह राष्ट्र देता है जिसे सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी हमारी सेना उठाती है। इसलिए, जो सैनिक शून्य से नीचे के तापमान और दुर्गम पहाड़ियों पर खड़े होकर देश को यह भरोसा देते हैं कि हमारी सीमाएँ सुरक्षित हैं, उनके प्रति आभार व्यक्त करना किसी भी सजग नागरिक का बुनियादी कर्तव्य बन जाता है।


सेना के पराक्रम पर राजनीति: राष्ट्रीय अस्मिता से खिलवाड़ क्यों?

लेख का सबसे संवेदनशील और विचारणीय पहलू सेना के शौर्य पर होने वाली समकालीन राजनीति से जुड़ा हुआ है। कुमार विश्वास ने अतीत के कुछ राजनीतिक विवादों और सर्जिकल स्ट्राइक जैसे सैन्य अभियानों का परोक्ष संदर्भ देते हुए कहा कि हमारा सबसे बड़ा वैचारिक संकट तब उत्पन्न होता है जब सेना द्वारा सीमा पार जाकर दिखाए गए पराक्रम पर देश के भीतर से ही सबूत मांगे जाने लगते हैं। उन्होंने बेहद कड़े और गंभीर लहजे में कहा कि किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र में राजनीतिक असहमति, विचारधाराओं का टकराव और नीतियों पर विरोध स्वाभाविक भी है और जरूरी भी, लेकिन इस विरोध की एक स्पष्ट लक्ष्मण रेखा होनी चाहिए।

विपक्ष या किसी भी नागरिक को तत्कालीन सरकार, प्रधानमंत्री या रक्षा मंत्री की रणनीतियों की आलोचना करने का पूरा अधिकार है। यदि सरकार की नीतियां दोषपूर्ण हैं, तो उन पर संसद से लेकर सड़क तक तीखे सवाल पूछे जाने चाहिए। परंतु, जब देश की सेना अपने प्राणों की बाजी लगाकर किसी मिशन को अंजाम देती है, तो उस सैन्य अभियान की प्रामाणिकता पर सवाल उठाना सीधे तौर पर सैनिकों के मनोबल को चोट पहुँचाना है। राजनीतिक असहमति को सेना के त्याग, बलिदान और शौर्य से पूरी तरह अलग रखा जाना चाहिए, क्योंकि सैनिक किसी एक राजनीतिक दल के कार्यकर्ता नहीं, बल्कि तिरंगे की आन-बान और शान के प्रहरी होते हैं।


राष्ट्रवाद का राजनीतिकरण: जब नारों को बनाया जाता है ढाल

कुमार विश्वास ने न केवल सेना के आलोचकों को कटघरे में खड़ा किया, बल्कि राष्ट्रवाद के नाम पर अपनी प्रशासनिक और राजनीतिक विफलताओं को छिपाने वाली शक्तियों पर भी उतना ही तीखा प्रहार किया। उन्होंने एक अत्यंत व्यावहारिक सत्य को उजागर करते हुए कहा कि आज के दौर में राष्ट्रवाद को बढ़ाना और घटाना, दोनों ही विशुद्ध राजनीति का हिस्सा बन चुके हैं। एक तरफ जहां एक धड़ा राष्ट्रवाद को पूरी तरह अप्रासंगिक और दकियानूसी बताने की बौद्धिक राजनीति करता है, वहीं दूसरी तरफ कुछ राजनीतिक दल राष्ट्रवाद का जरूरत से ज्यादा ढोल पीटकर बुनियादी मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाने की कोशिश करते हैं।

उन्होंने स्पष्ट किया कि बुनियादी प्रशासनिक विफलताओं का जवाब केवल ‘भारत माता की जय’ का नारा नहीं हो सकता; सरकारों से जवाबदेही तय करना भी नागरिकों का अधिकार है। कश्मीर के संदर्भ में उन्होंने बदलाव को रेखांकित किया जहाँ कभी अलगगाववादी सुर गूंजते थे, वहीं अब अमन और रोजगार की उम्मीदें जग रही हैं। इसके पीछे सैनिकों का सर्वोच्च योगदान है। लद्दाख के पैंगोंग संस्मरण में उन्होंने तिरंगे की असीम ऊर्जा का अनुभव साझा किया। साहित्य और सेना के रिश्ते को चारण परंपरा से जोड़ते हुए उन्होंने कहा कि ओजस्वी गीत जैसे “वीर तुम बढ़े चलो, धीर तुम बढ़े चलो” (पूर्ण पंक्तियों के लिए संदर्भ देखें) रक्षकों में साहस जगाते हैं। अंततः, राष्ट्रवाद केवल नारों का विषय नहीं बल्कि एक मूक और ठोस निष्ठा है।

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