“Political Storm in Bengal: TMC and BJP Unite Against Dhirendra Shastri After Congress Demands Arrest Over Anti-Non-Veg Dictat”

बागेश्वर धाम के प्रमुख धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री (बाबा बागेश्वर) की मुश्किलें पश्चिम बंगाल में दिए गए एक विवादित बयान के कारण बढ़ गई हैं। दुर्गा पूजा के दौरान मांसाहारी भोजन (मछली और मांस) न खाने की अपील करने पर कांग्रेस ने उनके खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है और प्राथमिकी (FIR) के साथ उनकी गिरफ्तारी की मांग की है।
🚨 मुख्य विवाद और शिकायत की वजह
- क्या कहा था धीरेंद्र शास्त्री ने? 5 सितंबर 2026 को पश्चिम बंगाल के हावड़ा (लिलुआ) में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने बंगाल के लोगों से दुर्गा पूजा और नवरात्रि के दौरान मांस-मछली न खाने का आग्रह किया था। उन्होंने त्योहार के समय पंडालों के पीछे नॉनवेज पकाने को “गंदा खाना” कहा और ऐसा करने वालों को कथित तौर पर ‘पाखंडी’ (Hypocrite) करार दिया था।
- कांग्रेस का आरोप: दक्षिण कोलकाता जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष प्रदीप प्रसाद ने कोलकाता के भवानीपुर थाने में शिकायत दर्ज कराई। कांग्रेस का कहना है कि धीरेंद्र शास्त्री की इस टिप्पणी से बंगालियों की धार्मिक और सांस्कृतिक भावनाएं आहत हुई हैं और यह बयान सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने तथा अशांति पैदा करने की एक साजिश है।
⚖️ राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं
इस बयान के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति पूरी तरह गरमा गई है और सभी प्रमुख दलों ने धीरेंद्र शास्त्री के इस ‘फरमान’ का विरोध किया है: [1]
- तृणमूल कांग्रेस (TMC): टीएमसी ने इस पर तीखी आपत्ति जताई है और पूछा है कि क्या बाहर से आए लोग अब बंगालियों की थाली से उनका पारंपरिक खाना छीनेंगे? [1]
- भारतीय जनता पार्टी (BJP): दिलचस्प बात यह है कि बीजेपी ने भी इस बयान से खुद को पूरी तरह अलग कर लिया है। पश्चिम बंगाल बीजेपी अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य और वरिष्ठ नेता दिलीप घोष ने कहा कि यह बाबा की व्यक्तिगत राय हो सकती है, लेकिन कोई बाहरी व्यक्ति बंगाल के खान-पान या पहनावे की संस्कृति को तय नहीं कर सकता। उन्होंने याद दिलाया कि बंगाल में शक्ति पूजा की अपनी एक प्राचीन परंपरा है, जहाँ कई मंदिरों में देवी को मछली और मांस का भोग भी लगाया जाता है।
धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के ‘नो नॉन-वेज’ बयान पर छिड़ा विवाद: क्या बंगाल की संस्कृति और परंपराओं को नहीं समझ पाए बाबा?
पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा से ठीक पहले बागेश्वर धाम के प्रमुख धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री (बाबा बागेश्वर) के एक बयान ने देशव्यापी राजनीतिक और सांस्कृतिक बहस छेड़ दी है। हावड़ा के लिलुआ में एक धार्मिक सभा के दौरान उन्होंने बंगाल के लोगों से नवरात्रि और दुर्गा पूजा के दौरान मांस-मछली (मांसाहारी भोजन) न खाने का आग्रह किया। उन्होंने पंडालों के पीछे नॉनवेज पकाने को “गंदा खाना” कहा और ऐसा करने वालों को ‘पाखंडी’ तक करार दे दिया। इस बयान के बाद कांग्रेस ने उनके खिलाफ कोलकाता के भवानीपुर थाने में शिकायत दर्ज कराई है, और पश्चिम बंगाल की राजनीति पूरी तरह गरमा गई है। यह विवाद सिर्फ खान-पान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बंगाल की सदियों पुरानी धार्मिक परंपराओं, क्षेत्रीय अस्मिता और आस्था के विविध रूपों से जुड़ा हुआ है।
🐟 बंगाल में मांसाहार: भोजन नहीं, एक धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा
धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के इस बयान के बाद जो सबसे बड़ा सवाल उठा है, वह यह है कि क्या वे बंगाल की स्थानीय संस्कृति और शक्ति पूजा के मूल स्वरूप को समझने में चूक गए? उत्तर भारत और देश के अन्य हिस्सों में नवरात्रि के दौरान पूरी तरह सात्विक (शाकाहारी) रहने की परंपरा है। लहसुन और प्याज तक का त्याग कर दिया जाता है। लेकिन पश्चिम बंगाल, असम और ओडिशा जैसे पूर्वी राज्यों में परंपराएं बिल्कुल अलग हैं।
बंगाल में मांसाहार केवल स्वाद का विषय नहीं है, बल्कि यह उनकी धार्मिक मान्यताओं का एक अभिन्न हिस्सा है। बंगाली संस्कृति में मछली को ‘जल तोरई’ या ‘माछ’ कहा जाता है, जिसे बेहद शुभ माना जाता है। यहाँ तक कि शादियों और शुभ कार्यों में मछली का शगुन अनिवार्य होता है।
🔱 शक्ति पूजा और ‘महाप्रसाद’ का विधान
सनातन धर्म में पूजा की पद्धतियां विविध हैं। बंगाल मुख्य रूप से शक्ति और तंत्र साधना का केंद्र रहा है। दुर्गा पूजा के दौरान देवी दुर्गा को महिषासुर मर्दिनी के रूप में पूजा जाता है।
- बली और भोग की परंपरा: बंगाल के कई ऐतिहासिक और पारंपरिक पंडालों, जमींदार बाड़ियों और कालीघाट व तारापीठ जैसे सिद्ध शक्तिपीठों में देवी को पशु बली (बकरे की) देने और मछली का भोग लगाने की प्राचीन परंपरा है।
- महाप्रसाद: देवी को अर्पित किए जाने के बाद इस मांस और मछली को ‘महाप्रसाद’ के रूप में भक्तों में वितरित किया जाता है। बंगाली हिंदुओं के लिए यह तामसिक भोजन नहीं, बल्कि मां का आशीर्वाद है। ऐसे में धीरेंद्र शास्त्री द्वारा इसे “गंदा खाना” या “पाखंड” कहना सीधे तौर पर बंगाल के करोड़ों हिंदुओं की आस्था पर चोट माना जा रहा है।
⚖️ शिकायत और राजनीतिक दलों का तीखा विरोध
कांग्रेस द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत में आरोप लगाया गया है कि धीरेंद्र शास्त्री ने जानबूझकर बंगालियों की धार्मिक भावनाओं को आहत किया है और समाज में अशांति फैलाने का प्रयास किया है। इस मुद्दे पर बंगाल की राजनीति में एक दुर्लभ एकजुटता देखने को मिली है, जहाँ सत्तारूढ़ टीएमसी और विपक्षी बीजेपी, दोनों एक सुर में बाबा के बयान के खिलाफ खड़े हो गए हैं:
- तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने इसे बंगाल की संस्कृति पर बाहरी हमला करार दिया। टीएमसी नेताओं का कहना है कि बंगाल के लोग सदियों से अपनी परंपरा के अनुसार पूजा मनाते आ रहे हैं और किसी भी बाहरी व्यक्ति को यह तय करने का अधिकार नहीं है कि बंगालियों की थाली में क्या परोसा जाएगा।
- भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने भी खुद को बाबा के बयान से पूरी तरह अलग कर लिया है। बंगाल बीजेपी अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य और वरिष्ठ नेता दिलीप घोष ने स्पष्ट किया कि शक्ति पूजा में खान-पान की अपनी क्षेत्रीय परंपराएं हैं। कोई भी बाहरी विचार बंगाल के लोगों पर नहीं थोपा जा सकता। यह बयान यह साफ करता है कि राजनीतिक रूप से भी कोई भी दल बंगाल की सांस्कृतिक पहचान से समझौता करने का जोखिम नहीं उठा सकता।
🤝 सनातन धर्म की विविधता बनाम एकरूपता की कोशिश
यह विवाद एक व्यापक वैचारिक बहस को भी जन्म देता है। सनातन धर्म की सबसे बड़ी खूबसूरती इसकी विविधता और उदारता है। यहाँ एक तरफ जहाँ अयोध्या और मथुरा में पूरी तरह सात्विक परंपरा का पालन होता है, वहीं कामाख्या और कालीघाट में शक्ति साधना का अलग स्वरूप है।
धीरेंद्र शास्त्री जैसे कथावाचक जब एक क्षेत्र की परंपरा को पूरे देश पर लागू करने की कोशिश करते हैं, तो विवाद होना लाजिमी है। भारत जैसे बहुसांस्कृतिक देश में “एक देश, एक खान-पान” का नियम धार्मिक स्तर पर भी लागू नहीं किया जा सकता। किसी एक क्षेत्र की धार्मिक पद्धति को श्रेष्ठ और दूसरे की पद्धति को ‘गंदा’ या ‘पाखंड’ कहना सनातन धर्म की मूल भावना के विपरीत नजर आता है।
📝 निष्कर्ष
दुर्गा पूजा बंगालियों के लिए सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि एक भावना है। धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के बयान ने भले ही उनके समर्थकों के बीच सुर्खियां बटोरी हों, लेकिन बंगाल की धरती पर इसे उनकी सांस्कृतिक समझ की कमी के रूप में देखा जा रहा है। कांग्रेस की पुलिस शिकायत और सभी राजनीतिक दलों के विरोध ने यह साफ कर दिया है कि आस्था के नाम पर किसी भी राज्य की सदियों पुरानी खान-पान की आदतों और धार्मिक विविधताओं पर उंगली उठाना किसी के लिए भी स्वीकार्य नहीं होगा।
यदि आप चाहें, तो मैं इस विषय पर आगे चर्चा कर सकता हूँ:
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- क्या आप बंगाल के शक्तिपीठों में भोग की ऐतिहासिक परंपरा के बारे में विस्तार से पढ़ना चाहते हैं?
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TMC and BJP Unite Against Dhirendra.
