Bar Council Lifts Ban on Practice for CJI-Opposing Graduates
BCI ने हैदराबाद की NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के 2026 बैच छात्रों की एडवोकेट बनने पर लगी रोक वापस ली.
इसके बाद बार काउंसिल, CJI का विरोध करने वाले लॉ graduates की प्रैक्टिस पर लगी रोक हटाई.

बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) ने हैदराबाद की नालसार (NALSAR) यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के 2026 बैच के छात्रों के वकील के रूप में appointment
बार काउंसिल ने injunction पर लगाई अंतरिम रोक वापस ले ली है। इसके बाद, बैकफुट पर बार काउंसिल, CJI का विरोध करने वाले लॉ graduates की प्रैक्टिस पर लगी रोक हटाई। बीसीआई स्पष्ट करता है कि जांच रिपोर्ट आने तक वह किसी छात्र के खिलाफ दंडात्मक फैसला नहीं करेगा.
विवाद की पृष्ठभूमि और मुख्य कारण
यह पूरा विवाद हैदराबाद की प्रतिष्ठित नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ (NALSAR) के आगामी दीक्षांत समारोह में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित करने से शुरू हुआ था। [1, 2]
- छात्रों का विरोध: यूनिवर्सिटी के करीब 1,400 छात्रों में से लगभग 450 छात्रों ने सीजेआई को बुलाने का पुरजोर विरोध किया। [1]
- विरोध की वजह: छात्र हाल ही में दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कथित बर्बरता से जुड़े एक मामले में सीजेआई द्वारा की गई मौखिक टिप्पणियों से असंतुष्ट थे। छात्रों का आरोप था कि मामले की सुनवाई के दौरान सीजेआई ने वीडियो साक्ष्य देखने से मना करते हुए कथित तौर पर असंवेदनशील टिप्पणी की थी। [1, 2]
बार काउंसिल का पहला कड़ा एक्शन
इस विरोध प्रदर्शन को अनुशासनहीनता और न्यायिक संस्था के अपमान के रूप में देखते हुए बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) ने तुरंत एक कड़ा फरमान जारी कर दिया। बीसीआई के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा के हस्ताक्षर वाले इस आदेश में सभी राज्यों की बार काउंसिल को निर्देश दिया गया कि वे नालसार के साल 2026 बैच के किसी भी छात्र का वकील (एडवोकेट) के तौर पर पंजीकरण न करें। इस आदेश से सैकड़ों प्रतिभावान लॉ graduates के भविष्य पर संकट मंडराने लगा, क्योंकि बिना राज्य बार काउंसिल में एनरोलमेंट के कोई भी व्यक्ति देश की अदालतों में वकालत की प्रैक्टिस नहीं कर सकता। [1, 2, 3, 4]
चौतरफा आलोचना और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सवाल
बीसीआई के इस तानाशाहीपूर्ण रवैये का कानूनी गलियारों में भारी विरोध शुरू हो गया। [1]
- वरिष्ठ वकीलों की आपत्ति: देश के पूर्व अटॉर्नी जनरल और वरिष्ठ अधिवक्ता के.के. वेणुगोपाल ने बीसीआई के इस फैसले की तीखी आलोचना की। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक तरीके से अपना विरोध दर्ज कराने वाले छात्रों का करियर रोकना ‘रूल ऑफ लॉ’ (कानून के शासन) और संविधान द्वारा दी गई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सीधा उल्लंघन है। [1]
- छात्रों के भविष्य की चिंता: कानूनी विशेषज्ञों ने आगाह किया कि इस सामूहिक प्रतिबंध से उन निर्दोष छात्रों का भविष्य भी दांव पर लग गया था, जिन्हें बड़ी कंपनियों या कानूनी फर्मों में प्लेसमेंट मिल चुका था। [1]
बैकफुट पर क्यों आई बार काउंसिल?
राजनीतिक दलों (जैसे कॉकरोच जनता पार्टी) और कानूनी बिरादरी से जुड़े विभिन्न संगठनों द्वारा आंदोलन की चेतावनी और चौतरफा घिरने के बाद बार काउंसिल को अपनी गलती का अहसास हुआ। कुछ ही घंटों के भीतर बीसीआई ने इस प्रतिबंधात्मक आदेश को पूरी तरह से वापस ले लिया। [1, 2]
बीसीआई ने नया बयान जारी कर कहा कि वे ‘उचित और तर्कसंगत आलोचना’ तथा ‘संस्थागत व्यवधान’ के बीच अंतर को समझते हैं। काउंसिल ने नालसार यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर प्रोफेसर श्रीकृष्ण देवा राव से तीन दिनों के भीतर एक तथ्यात्मक रिपोर्ट मांगी है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि इस पूरे विरोध अभियान को हवा देने वाले मुख्य सूत्रधार कौन थे। [1, 2, 3, 4]
बार काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा रोक हटाना कानून के छात्रों की एक बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, बीसीआई आगामी 19 अगस्त 2026 को होने वाली बैठक में विश्वविद्यालय की जांच रिपोर्ट के आधार पर अंतिम फैसला लेगी। इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि देश के सर्वोच्च नियामक निकायों को भी छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकारों और उनके करियर से जुड़े फैसलों पर अत्यंत संवेदनशीलता और परिपक्वता दिखाने की आवश्यकता है। [1, 2]
BCI ने हैदराबाद नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ 2026 बैच के लॉ graduates के appointment पर लगी रोक हटा ली. यह निर्णय कुछ घंटों के भीतर लिया गया और पूर्व आदेश संशोधित किया गया. आदेश में [10831944/0] शामिल है.
बार काउंसिल ने स्पष्ट किया कि मामले की जांच पूरी होने तक किसी दंडात्मक फैसले को नहीं लिया जाएगा. यह यू-टर्न इस बैच के छात्रों के पक्ष में है. बाद में अब वे देश की किसी भी राज्य बार काउंसिल में पंजीकरण कर सकेंगे.
विवाद की शुरुआत: सीजेआई के खिलाफ अभियान
इस पूरे विवाद की जड़ें हैदराबाद स्थित नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ (NALSAR) में होने वाले आगामी दीक्षांत समारोह से जुड़ी हैं [10831944/0]। दरअसल, विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस समारोह में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित करने का प्रस्ताव रखा था [10831944/0]।
- छात्रों की आपत्ति: इस प्रस्ताव के सामने आते ही यूनिवर्सिटी के 1,400 छात्रों में से करीब 450 छात्रों ने एक साझा पत्र लिखकर सीजेआई को बुलाने का कड़ा विरोध किया [11906362/0, 10831944/0]।
- विरोध का कारण: छात्रों का असंतोष पिछले दिनों दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कथित बर्बरता से जुड़े एक मामले में सीजेआई की टिप्पणियों को लेकर था [10831944/0]। छात्रों का आरोप था कि सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने वीडियो साक्ष्य देखने से इनकार करते हुए कथित तौर पर असंवेदनशील मौखिक टिप्पणी की थी।
बार काउंसिल का पहला सख्त फैसला
छात्रों के इस विरोध अभियान की खबर जब बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) तक पहुंची, तो नियामक संस्था ने इसे देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था और मुख्य न्यायाधीश के पद का घोर अपमान माना [10831944/0]। बीसीआई के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा ने एक सख्त आदेश जारी करते हुए देश की सभी राज्य बार काउंसिलों को निर्देश दिया कि वे नालसार के साल 2026 बैच के किसी भी छात्र का एडवोकेट के तौर पर एनरोलमेंट तुरंत प्रभाव से रोक दें [10831944/0]। बीसीआई का तर्क था कि जो छात्र देश की सर्वोच्च न्यायपीठ का सम्मान नहीं कर सकते, वे कानूनी बिरादरी में शामिल होने के योग्य नहीं हैं [10831944/0]। इस सामूहिक प्रतिबंध के कारण सैकड़ों बेकसूर छात्रों के करियर और कॉर्पोरेट प्लेसमेंट पर अचानक संकट के बादल मंडराने लगे थे।
चौतरफा आलोचना और अभिव्यक्ति की आजादी का सवाल
बार काउंसिल के इस अभूतपूर्व और कठोर फैसले की कानूनी जगत, पूर्व जजों और वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने तीखी आलोचना की [10831944/0]।
- रूल ऑफ लॉ का उल्लंघन: कई कानूनी विशेषज्ञों ने कहा कि लोकतांत्रिक तरीके से अपना विरोध या असहमति दर्ज कराना छात्रों का संवैधानिक अधिकार है [10831944/0]। इसके लिए पूरे बैच के करियर को दांव पर लगाना ‘रूल ऑफ लॉ’ (कानून के शासन) के खिलाफ है।
- इनोसेंट छात्रों का नुकसान: यह दलील भी दी गई कि केवल 450 छात्रों के विरोध के कारण पूरे 1,400 छात्रों के बैच को सजा देना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है [11906362/0, 10831944/0]।
एडवोकेट्स एक्ट, 1961 और बीसीआई के अधिकार
इस कानूनी टकराव ने एडवोकेट्स एक्ट, 1961 के तहत बीसीआई के अधिकारों की सीमाओं को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है:
- appointment का अधिकार: अधिनियम की धारा 24 के तहत, राज्य बार काउंसिल के पास वकीलों को नामांकित करने का प्राथमिक अधिकार है, न कि सीधे बीसीआई के पास।
- अनुशासनात्मक शक्तियां: बीसीआई के पास पेशेवर कदाचार (Professional Misconduct) के मामलों में सर्वोच्च अपीलीय और नियामक शक्ति है, लेकिन एक पूरे कॉलेज बैच पर पूर्व-व्यापी (Pre-emptive) सामूहिक प्रतिबंध लगाने का कोई स्पष्ट वैधानिक प्रावधान नहीं है। कानूनी विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह मामला अदालत में जाता, तो बीसीआई का पुराना आदेश कानूनी कसौटी पर टिक नहीं पाता।
बैकफुट पर बीसीआई: आदेश वापसी और आगामी बैठक
चौतरफा कानूनी और सामाजिक दबाव के बाद बीसीआई ने अपनी आपातकालीन बैठक बुलाई और सर्वसम्मति से यह माना कि इस बैच के अधिकांश छात्र निर्दोष हैं और वे किसी भी प्रकार के संस्थागत अनादर में शामिल नहीं थे [10831944/0]। इसके बाद परिषद ने अपने पहले आदेश में संशोधन करते हुए रोक को हटा दिया [10831944/0]।
हालांकि, विवाद अभी पूरी तरह शांत नहीं हुआ है। बार काउंसिल ने नालसार यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर प्रोफेसर श्रीकृष्ण देवा राव से तीन दिनों के भीतर एक विस्तृत और तथ्यात्मक जांच रिपोर्ट मांगी है [10831944/0]। इस रिपोर्ट के माध्यम से उन मुख्य चेहरों और ‘सूत्रधारों’ की पहचान की जाएगी जिन्होंने इस विरोध अभियान का नेतृत्व या समन्वय किया था [10831944/0]।
निष्कर्ष
इस पूरे मामले पर अंतिम निर्णय आगामी 19 अगस्त 2026 को होने वाली बीसीआई की बैठक में लिया जाएगा [10831944/0]। इस बैठक में विश्वविद्यालय की रिपोर्ट के आधार पर केवल उन विशिष्ट छात्रों के खिलाफ कार्रवाई पर विचार हो सकता है जो सीधे तौर पर इस विवाद में शामिल थे [10831944/0]। इस घटनाक्रम ने एक बार फिर न्यायपालिका के सम्मान और नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच के नाजुक संतुलन पर बहस को तेज कर दिया है
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