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Germany Election Blowout: Far-right AfD wins historic 44% in Saxony-Anhalt, shattering post-WWII political norms.
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Germany Election Blowout: Far-right AfD wins historic 44% in Saxony-Anhalt, shattering post-WWII political norms.

By Saba
September 7, 2026 6 Min Read
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जर्मनी के पूर्वी राज्य सैक्सोनी-अनहाल्ट (Saxony-Anhalt) के हालिया प्रांतीय चुनावों में धुर दक्षिणपंथी पार्टी अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (AfD) ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। 6 सितंबर 2026 को घोषित शुरुआती नतीजों के अनुसार, पार्टी ने लगभग 43.8% से 44.5% वोट हासिल किए हैं, जो पिछली बार से दोगुने से भी अधिक हैं। द्वितीय विश्व युद्ध (यानी नाजी शासन के अंत) के बाद यह पहली बार है जब किसी धुर दक्षिणपंथी पार्टी ने जर्मनी के किसी राज्य में इस तरह की बड़ी चुनावी सफलता हासिल की है।

इस चुनावी नतीजे से जुड़ी मुख्य बातें और राजनीतिक समीकरण इस प्रकार हैं:

1. सीटों का समीकरण और सरकार बनाने की चुनौती

  • बहुमत से थोड़ा पीछे: सैक्सोनी-अनहाल्ट की 83 सदस्यीय विधानसभा में AfD को 39 सीटें मिलने का अनुमान है। सरकार बनाने के लिए आवश्यक 42 सीटों के बहुमत से पार्टी मात्र 3 सीट दूर है।
  • फायरवॉल (Firewall) की दीवार: जर्मनी की सभी मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों (जैसे चांसलर फ्रीडरिष मैर्त्स की CDU) ने AfD के साथ गठबंधन करने या सहयोग करने से पूरी तरह इनकार कर रखा है। इस नीति को जर्मनी में “फायरवॉल” कहा जाता है, जिसका उद्देश्य धुर दक्षिणपंथियों को सत्ता से दूर रखना है। इसलिए बड़ी जीत के बावजूद AfD के लिए अकेले सरकार बनाना एक बड़ी चुनौती है।

2. नाजी दौर से तुलना और चिंताएं क्यों?

  • चरमपंथी वर्गीकरण: जर्मनी की घरेलू खुफिया एजेंसी ने AfD की राज्य शाखा को आधिकारिक तौर पर “राइट-विंग एक्सट्रीमिस्ट” (कट्टर दक्षिणपंथी चरमपंथी) की श्रेणी में डाला हुआ है।
  • विवादित नीतियां: पार्टी के 35 वर्षीय मुख्य उम्मीदवार उलरिश जिगमुंड (Ulrich Siegmund) और राष्ट्रीय सह-अध्यक्ष एलिस वाइडल (Alice Weidel) के नेतृत्व में पार्टी ने सख्त आव्रजन विरोधी (Anti-immigration) नीतियां, अवैध प्रवासियों को तुरंत वापस भेजने (Remigration), स्कूलों में पारंपरिक राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने और रूस के प्रति नरम रुख रखने जैसे मुद्दों पर चुनाव लड़ा है।
  • इतिहास की याद: आलोचकों और कई यूरोपीय नेताओं का मानना है कि जर्मनी के अतीत और नाजी इतिहास को देखते हुए इस तरह की कट्टर विचारधारा वाली पार्टी का उभार चिंताजनक है। पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क और फ्रांस के मंत्रियों ने इसे पूरे यूरोप के लिए एक “गंभीर क्षण” बताया है।

3. वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिक्रियाएं

  • चांसलर को बड़ा झटका: वर्तमान जर्मन चांसलर फ्रीडरिष मैर्त्स (Friedrich Merz) की पार्टी CDU को इस चुनाव में भारी नुकसान हुआ है और वह करीब 17.2% वोटों के साथ दूसरे स्थान पर सिमट गई है। मैर्त्स ने इस नतीजे पर गहरी चिंता और “स्तब्धता” जताई है।
  • अंतरराष्ट्रीय समर्थन: इस बंपर जीत पर अमेरिकी राजनेता डोनाल्ड ट्रम्प ने सोशल मीडिया पर आंकड़े साझा किए, जबकि टेक बिलियनेयर एलन मस्क ने जर्मन भाषा में “वेल डन!” (अच्छा किया) लिखकर पार्टी को बधाई दी है।

जर्मनी की राष्ट्रीय राजनीति में भी AfD की लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही है और वर्तमान सर्वे में यह देश की सबसे लोकप्रिय पार्टी (करीब 28% समर्थन के साथ) बनकर उभर रही है, जिसका असर 2029 के आगामी आम चुनावों पर भी देखने को मिल सकता है।

जर्मनी में 90 साल बाद फिर गूंजा दक्षिणपंथ! AfD की बंपर जीत ने दिलाई नाजी दौर की याद!

विशेष इन-डेप्थ रिपोर्ट: राजनीति डेस्क
बर्लिन / मैगडेबर्ग (जर्मनी)

जर्मनी की राजनीति में रविवार, 6 सितंबर 2026 का दिन इतिहास के पन्नों में एक ऐसे काले और अभूतपूर्व मोड़ के रूप में दर्ज हो गया है, जिसने न केवल जर्मनी बल्कि पूरे यूरोपीय संघ (EU) की नींव हिला दी है। जर्मनी के पूर्वी राज्य सैक्सोनी-अनहाल्ट (Saxony-Anhalt) के प्रांतीय चुनावों में धुर दक्षिणपंथी पार्टी ‘अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी’ (AfD) ने ऐतिहासिक और प्रचंड बहुमत हासिल किया है।

शुरुआती आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, AfD ने अविश्वसनीय रूप से 43.8% से 44.5% तक वोट हासिल किए हैं। यह आंकड़ा पार्टी के इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा और जर्मनी की आधुनिक लोकतांत्रिक राजनीति के लिए सबसे स्तब्ध करने वाला नतीजा है। 1945 में एडॉल्फ हिटलर के नाजी शासन (Third Reich) के अंत के बाद यह पहला मौका है, जब किसी ऐसी पार्टी ने जर्मनी के किसी राज्य में नंबर वन का स्थान हासिल किया है, जिसे खुद देश की खुफिया एजेंसी आधिकारिक तौर पर “कट्टर दक्षिणपंथी चरमपंथी” मानती है।


1. चुनावी आंकड़े: चांसलर की करारी हार, AfD बहुमत के करीब

सैक्सोनी-अनहाल्ट की 83 सदस्यीय प्रांतीय विधानसभा में सरकार बनाने के लिए 42 सीटों के जादुई आंकड़े की जरूरत है। घोषित नतीजों के मुताबिक:

  • AfD (अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी): 39 सीटें (43.8%+ वोट)
  • CDU (चांसलर फ्रीडरिष मैर्त्स की पार्टी): 17.2% वोट (दूसरे स्थान पर)

वर्तमान जर्मन चांसलर फ्रीडरिष मैर्त्स (Friedrich Merz) की केंद्र-दक्षिणपंथी पार्टी (CDU) के लिए यह चुनाव एक राजनीतिक तबाही साबित हुआ है। चांसलर मैर्त्स ने बर्लिन में बेहद गंभीर मुद्रा में प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए स्वीकार किया, “इस चुनावी परिणाम ने हमारी पार्टी और जर्मनी के लोकतांत्रिक ताने-बाने की जड़ों को हिलाकर रख दिया है। यह एक स्तब्ध करने वाला क्षण है।”

दूसरी ओर, AfD की राष्ट्रीय सह-अध्यक्ष एलिस वाइडल (Alice Weidel) ने इस जीत को एक नया युग बताते हुए कहा, “यह मतदाताओं का स्पष्ट जनादेश है। जर्मनी के लोग अब बदलाव चाहते हैं और हमें सत्ता से बाहर रखने की जिद लोकतंत्र का अपमान होगी।”


2. आखिर नाजी दौर से क्यों की जा रही है इसकी तुलना?

यह महज एक चुनावी जीत नहीं है, बल्कि आलोचकों और इतिहासकारों के अनुसार यह उस विचारधारा की वापसी है जिसे जर्मनी ने 90 साल पहले देखा था। इस तुलना के पीछे निम्नलिखित गंभीर कारण हैं:

  • खुफिया एजेंसी का ठप्पा: सैक्सोनी-अनहाल्ट में AfD के संगठन को जर्मनी की घरेलू खुफिया एजेंसी (BfV) ने आधिकारिक तौर पर “राइट-विंग एक्सट्रीमिस्ट” (उग्र दक्षिणपंथी चरमपंथी संगठन) की श्रेणी में वर्गीकृत किया हुआ है। इसके बावजूद जनता ने इसे खुलकर वोट दिया।
  • ‘रेमीग्रेशन’ (Remigration) का खौफनाक एजेंडा: 35 वर्षीय स्थानीय AfD नेता और मुख्य चेहरा उलरिश जिगमुंड (Ulrich Siegmund) ने अपने प्रचार में सख्त आव्रजन-विरोधी नीतियों को केंद्र में रखा। उनका सबसे विवादित एजेंडा ‘रेमीग्रेशन’ है, जिसके तहत जर्मनी में रह रहे लाखों अवैध प्रवासियों, शरणार्थियों और यहाँ तक कि नागरिकता ले चुके उन लोगों को भी वापस भेजने की योजना है जो ‘जर्मन संस्कृति’ में ढल नहीं पाए हैं। इतिहासकार इसे नाजियों के ‘यहूदी निष्कासन प्लान’ की तरह देख रहे हैं।
  • राष्ट्रवाद और हिटलर के भाषणों की गूंज: चुनावी रैलियों में AfD नेताओं द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली भाषा, मुहावरे और नारे हूबहू वैसे ही हैं जो कभी 1930 के दशक में हिटलर का प्रोपेगैंडा विभाग इस्तेमाल करता था। इसके अलावा, स्कूलों से समलैंगिक (LGBTQ) प्रतीकों को हटाकर कट्टर राष्ट्रवाद की पढ़ाई अनिवार्य करने का वादा भी नाजियों की ‘युवा नीतियों’ की याद दिलाता है।

3. वैश्विक प्रतिक्रिया: मस्क और ट्रम्प खुश, यूरोप में दहशत

जर्मनी में धुर दक्षिणपंथ के इस उदय ने वैश्विक राजनीति को दो धड़ों में बांट दिया है:

  • मस्क और ट्रम्प का समर्थन: दक्षिणपंथी ताकतों के वैश्विक उभार के बीच, अमेरिकी राजनेता डोनाल्ड ट्रम्प ने सोशल मीडिया पर इस जीत के आंकड़े साझा कर इसे ऐतिहासिक बताया। वहीं, दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति एलन मस्क (Elon Musk) ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर जर्मन भाषा में “Well done!” (बहुत बढ़िया) लिखकर AfD को खुली बधाई दी, जिससे विवाद और बढ़ गया है।
  • यूरोपीय संघ में हड़कंप: फ्रांस, पोलैंड और ऑस्ट्रिया जैसे पड़ोसी देशों के नेताओं ने इस पर गहरी चिंता जताई है। फ्रांस के विदेश मंत्रालय के सूत्रों ने इसे पूरे यूरोपीय संघ (EU) की एकजुटता और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए एक “गंभीर और डरावना मोड़” करार दिया है।

4. ‘फायरवॉल’ (Brandmauer) की अग्निपरीक्षा

हालांकि AfD सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, लेकिन वह बहुमत (42 सीटें) से 3 सीट दूर है। जर्मनी की संसदीय व्यवस्था में कोई भी दल अकेले सरकार नहीं बना सकता यदि उसके पास पूर्ण बहुमत न हो।

जर्मनी की सभी मुख्यधारा की लोकतांत्रिक पार्टियों (CDU, SPD, ग्रीन्स) ने एक ऐतिहासिक कसम खाई हुई है जिसे जर्मन भाषा में ‘ब्रांडमाउर’ (Brandmauer) या ‘फायरवॉल’ (अभेद्य दीवार) कहा जाता है। इसके तहत कोई भी पार्टी AfD के साथ न तो गठबंधन करेगी और न ही सरकार बनाने में उसका समर्थन करेगी।

लेकिन इस त्रिशंकु स्थिति में पेंच यह है कि यदि सभी पार्टियां मिलकर भी सरकार बनाती हैं, तो वह इतनी कमजोर और बेमेल होगी कि राज्य में राजनीतिक अस्थिरता फैल जाएगी, जिसका सीधा फायदा भविष्य में AfD को ही मिलेगा।


5. निष्कर्ष: 2029 के आम चुनाव के लिए खतरे की घंटी

सैक्सोनी-अनहाल्ट का यह चुनावी नतीजा सिर्फ एक राज्य की कहानी नहीं है। हालिया राष्ट्रीय ओपिनियन पोल्स (Surveys) दिखाते हैं कि AfD पूरे जर्मनी में 28% से 30% समर्थन के साथ देश की सबसे लोकप्रिय राजनीतिक शक्ति बन चुकी है।

यदि यही ट्रेंड जारी रहा, तो साल 2029 में होने वाले जर्मनी के राष्ट्रीय आम चुनावों में धुर दक्षिणपंथी बर्लिन की केंद्रीय सत्ता पर काबिज हो सकते हैं। दुनिया के लिए यह विचार ही दहला देने वाला है कि जिस देश ने हिटलर की तानाशाही और होलोकॉस्ट (नरसंहार) का दंश झेला, वही जर्मनी 90 साल बाद फिर से उसी वैचारिक रास्ते पर आगे बढ़ रहा है।


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